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Hindi moral story : बुद्धि से काम लो तो कुछ भी असंभव नहीं ।

     






 एक गीदड़ जंगल में किसी शिकार की तलाश में घूम रहा था । कई दिनों की भूख ने उसे बहुत परेशान कर रखा था , तभी सुबह से शाम तक जंगल में घूमता फिर रहा था ।

      एक स्थान पर उसने मरे हुए हाथी को देखा तो उसका मन खुशी से उछल पड़ा और दांत फाड़ता हुआ बोला - ' वाह - वाह भगवान ! क्या खाने को दिया है- पूरा हाथी । ' इसे तो वह महीनों तक अपना भोजन बना सकता है । उसकी भूख  का इलाज हो गया। 

      मगर जब उसने देखा कि उस हाथी की खाल इतनी सख्त है कि उसके दांतों से भी नहीं कटती तो उसके मन को निराशा हुई । भूख के मारे पहले से ही उसका बुरा हाल हो रहा था । गीदड़ बेचारा उस मरे हुए हाथी के पास ही बैठकर सोचने लगा - ' अब क्या करूं ?

     ' इसी बीच उधर से एक शेर आ निकला । गीदड़ ने सोचा , अब मेरा काम अवश्य बनेगा । वह भागा - भागा शेर के पास जाकर बोला - ' महाराज ! देखो , यह आपका शिकार पड़ा है । मैं तो आपके लिए ही इसकी रखवाली कर रहा था ताकि आपके आने से पहले इसे कोई जूठा न कर दे । इतने बड़े शिकार पर पहला हक़ तो राजा का ही होता है । ' शेर ने सामने मरे पड़े हाथी की ओर देखा , फिर घृणा से नाक सिकोड़ते हुए गीदड़ की ओर देखकर बोला - ' ऐ मूर्ख ! मैं अपना शिकार खुद ही मारकर खाता हूं । मैं शेर हूं , दूसरे का मारा शिकार खाना मेरे लिए पाप है । तुमने यह उदाहरण तो सुना होगा कि जंगलों में रहने वाले शेर भूखे तो मर जाएंगे मगर घास कभी नहीं खाएंगे ।

     ' यह कहकर शेर वहां से चलता बना मगर गीदड़ बेचारा भूखा बैठा रहा । उसे रह - रह कर शेर पर गुस्सा आ रहा था - ' देखो न ! कितनी अकड़ है उसमें , जो बड़े मजे से कहता है कि मैं दूसरे का मारा शिकार नहीं खाता । जिस दिन भूखा मरेगा , सारी अकड़ ढीली हो जाएगी , चलना भूल जाएगा । 

     ' अभी गीदड़ यह सब सोच ही रहा था कि उधर से एक बाघ आ निकला जो काफी थका हुआ लग रहा था । शायद यह भी उसकी भांति कई दिन का भूखा है जो बड़े धीरे से चल रहा है । शायद उसके आने से ही अपना काम बन जाए , यह सोचकर गीदड़ बाघ के पास गया और हंसते हुए बोला - ' मामाजी प्रणाम ! आप इधर कैसे चले आए ? यह हाथी तो हमारे राजा शेर ने मारा है और मुझे कह गया है कि जब तक मैं न आऊं , तू इस जगह से हिलना नहीं । ख़ासकर उसने यह भी कहा है कि कोई बाघ आ जाए तो मुझे अवश्य सूचित करना । 

     ' बाघ ने जैसे ही यह सुना , वह वहां से भागने लगा - ' अरे भाई सुनो तो । ' गीदड़ ने भागते बाघ को आवाज़ दी । मगर बाघ तो अंधाधुंध भाग रहा था । जाते जाते इतना ही कह गया कि ' भांजे , शेर को मत बताना कि मैं यहां आया था । '

     ' यह भी गया , गीदड़ ने माथे पर हाथ मारते हुए कहा । बाघ के जाने के पश्चात् एक चीता वहां आ गया । गीदड़ ने जैसे ही चीते को देखा , बहुत खुश हुआ । उसे पता था , चीते के दांत बहुत तेज़ होते हैं । इसे ही अपने जाल में फांसकर हाथी की चमड़ी को कटवाता हूं । ' यही सोचकर उसने चीते के पास जाकर कहा — ' मामाजी ! यह शिकार शेर ने किया है और वह नहाने के लिए किसी नदी पर गया है । तुम जल्दी से इसमें से खा लो । जैसे ही शेर आता दिखाई देगा , मैं तुम्हें बता दूंगा । 

      ' चीते ने अपने तेज़ दांतों से हाथी की सारी खाल उतार दी । गीदड़ ने दूर से ही देख लिया था कि अब सारी खाल उतर चुकी है । अब इस चीते को भगाना चाहिए अतः शोर मचाने लगा - ' चीते मामा , भाग जाओ , शेर आ रहा है , भाग जाओ । ' 

     शेर के आने की खबर सुनते ही चीता वहां से भाग निकला । गीदड़ का काम अब बन गया । वह मजे से हाथी का मांस खाकर अपनी भूख मिटाने लगा । अपनी तेज़ बुद्धि के कारण ही उसे यह पूरा हाथी खाने को मिल गया था । 

      शिक्षा : बुद्धि बड़ी बलवान होती है । यदि आपका कोई कार्य प्रथम प्रयास में न बने तो भी बुद्धि का प्रयोग कर उसे बार - बार साधने का प्रयत्न करना चाहिए , जैसे इस चालाक एवं बुद्धिमान गीदड़ ने किया ।

धन्यवाद 

जय हिन्द जय भारत। 

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