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Hindi moral story :बूढ़े का वरदान।

 




    एक बार एक बूढ़ा अशक्त राहगीर सड़क पर चला जा रहा था । और रात का अंधेरा छाने वाला था । बूढ़े ने किसी तरह रात बिताने के लिए पनाह लेने की सोची । उसने एक बड़े - से घर के दरवाजे पर जाकर दस्तक दी । वह घर एक धनवान का घर था ।

 " क्या मुझे आप अपने घर के आंगन में रात बिताने के लिए जगह दे देंगी । सुबह होते ही चला जाऊंगा । आपकी बड़ी कृपा होगी । " बूढ़े व्यक्ति ने विनम्रता से आग्रह किया । 

उसकी आवाज सुनकर घर की अमीर मालकिन दरवाजे पर आई और अजनबी बूढ़े को फटकारने और बुरा - भला कहने लगी ।

 बूढ़ा आगे चल दिया । पास में ही कुछ आगे चलकर उसे किसी गरीब का छोटा - सा घर दिखाई दिया । उसने दरवाजा खटखटाया । बूढ़ा वहां भी अनुनय - विनय से बोला- " भले लोगो ! मुझे अपने घर में एक रात के लिए पनाह दे दो । सुबह होते ही मैं चला जाऊंगा । 

" बाबा ! अंदर चले आओ । " अंदर से आवाज आई ।

 उस बूढ़े के अंदर पहुंचने पर घर की मालकिन ने कहा- " बाबा ! तुम आराम से निश्चित होकर हमारे घर में रात बिता सकते हो । मगर यहां जगह की थोड़ी तंगी है और बच्चों का शोरगुल भी बहुत है । आपको परेशानी हो सकती है । 

बूढ़े अजनबी ने घर के अंदर देखा , सचमुच उस घर में बहुत गरीबी थी । वहां उसे बच्चे दिखाई दिए जो फटेहाल थे । तन ढकने के लिए भी उनके पास कपड़े नहीं थे । उनकी कमीजें फटी - पुरानी थीं । बूढ़े को उन पर तरस आ गया ।

 " तुम्हारे बच्चे ऐसे फटेहाल क्यों हैं ? " अजनबी बूढ़े ने पूछा । " तुम इनको नई कमीजें क्यों नहीं बनवा देती हो ?

 " ' बाबा ! नई कमीजें बनवा कहां से दूं ? " औरत ने जवाब दिया- “ मेरे पति का देश की रक्षा में लड़ाई के दौरान देहांत हो चुका है और बच्चों के पालन - पोषण का भार मुझे अकेले ही उठाना पड़ रहा है । कपड़ों की तो बात दूर रही , हमारे पास तो खाने के लिए भी पैसे नहीं हैं । जैसे - तैसे गुजारा करते हैं ।

 ' घर की मालकिन ने रूखा - सूखा जो भी खाना उसके पास था , रात को मेज पर लगा दिया और अजनबी से खाने में शामिल होने को कहा । 

' धन्यवाद ! " बूढ़े ने जवाब दिया- " मुझे भूख नहीं है । मैंने अभी थोड़ी देर पहले ही खाना खाया है । 

" फिर उसने अपना थैला खोला । उसमें से खाने की सभी चीजें निकालकर बच्चों को खिलाईं । इसके बाद वह लेट गया और लेटते ही खर्राटे लेने लगा । 

सुबह हुई तो बूढ़ा उठा । उसने घर की मालकिन का शुक्रिया अदा किया और वहां से रवाना होते समय उसने कहा- “ तुम जो काम सुबह शुरू करोगी , शाम तक उसे ही जारी रखोगी ।

 यह कहकर वह बूढ़ा घर से बाहर निकला । 

वह औरत अजनबी बूढ़े के इन शब्दों का अर्थ नहीं समझी और उस पर खास ध्यान भी नहीं दिया । वह बूढ़े को दरवाजे तक छोड़ने आयी और उसे विदा करके घर लौटी ।

 उस बूढ़े अजनबी की बात उसके दिमाग में चोट करने लगी - जब इस बूढ़े आदमी ने भी कहा कि मेरे बच्चे चिथड़े पहने हुए हैं तो बाकी लोग इन बिना बाप के बच्चों को क्यों न कहेंगे ? उसने घर में पड़े हुए कपड़े के आखिरी टुकड़े से कमीज सीने का इरादा किया । इसलिए वह अपनी धनी पड़ोसन के घर गज लेने गई ताकि उस कपड़े को मापे और यह देखे कि वह कमीज के लिए काफी है या नहीं ।

 गरीब औरत अपनी धनी पड़ोसन के घर से लौटकर सीधे उस कोठरी में गई जहां घर का सामान रखा जाता था । उसने अलमारी से कपड़ा लिया और उसे गज से मापने लगी । वह मापती जाती थी और कपड़ा अधिकाधिक लम्बा होता जाता था । उसका अंत ही नजर नहीं आता था ।

 वह दिन भर उसे मापती रही और शाम होने पर ही उसे खत्म कर पाई । ओह ! तो यह मतलब था उस अजनबी के शब्दों का । उसने सोचा । 

उसी शाम वह धनी पड़ोसन को उसका गज वापस देने गयी । उसने अपनी पड़ोसन को सारा किस्सा सच - सच कह सुनाया और बोली- “ अब मैंने नये - नये थानों से कोठरी भर ली है । अब हमारी गरीबी मिट जाएगी ।

 " ' हाय राम ! मैंने उस बूढ़े को अपने घर में रात क्यों नहीं बिताने दी । ' उस धनी औरत ने मन ही मन सोचा । उसने फौरन अपने नौकर को बुलाकर कहा- " जल्दी से गाड़ी में घोड़ा जोतो और बूढ़े भिखारी के पीछे जाओ । जैसे भी हो , उसे वापस लेकर आओ । 

" नौकर सरपट घोड़ा दौड़ाता हुआ उस भिखारी की तलाश में चल दिया । अगले दिन वह उस बूढ़े भिखारी से जा मिला । मगर बूढ़े भिखारी ने वापस चलने से इंकार कर दिया । 

नौकर ने दु : खी होकर कहा- ' बाबा ! मेरी जान मुसीबत में पड़ गई है । मुझ पर दया करो । अगर तुम्हें लेकर वापस नहीं जाता तो मालकिन पगार दिए बिना ही मुझे नौकरी से निकाल देगी । मेरी नौकरी का सवाल है बाबा !

 " " दु : खी न होओ नौजवान ! " बूढ़े ने कहा- " चलो , मैं तुम्हारे साथ चलता हूं । " बूढ़ा भिखारी घोडागाड़ी में सवार होकर नौकर के साथ चल दिया । 

धनी औरत पहले से ही अपने फाटक पर खड़ी बड़ी बेसब्री से उनके लौटने का इंतजार कर रही थी । उसने बूढ़े का स्वागत किया । उसे अच्छा पकवान खिलाया - पिलाया और सोने के लिए नर्म बिस्तर बिछाकर कहा- " प्यारे बाबा साहब ! लेटकर आराम करो ।

 " वह बूढ़ा उस धनी औरत के घर में तीन दिन रहा ।

वह बूढ़ा खाता - पीता आराम करता और पाइप के कश लगाता रहता । धनी औरत उसे खाने - पीने को देती रही । मीठी - मीठी बातें करती रही और मन ही मन गुस्से से उबलती रही - ' न जाने यह बूढ़ा खूसट कब यहां से जाएगा ? 

' मगर वह बूढ़े को निकालने की हिम्मत नहीं कर पाती । क्योंकि ऐसा करने से उसकी सारी मेहनत पर पानी फिर जाता ।

 चौथे दिन सुबह ही बूढ़े ने वहां से चलने की तैयारी शुरू कर दी । उसे जाते देख धनी औरत की खुशी का ठिकाना न रहा । वह उसे विदा करने के लिए घर से बाहर निकली । बूढ़ा चुपचाप फाटक तक पहुंचा और बिना कुछ बोले ऐसे ही बाहर निकल गया । 

तब उस अमीर औरत से रहा नहीं गया । उसने अपने को वश में न रखकर पूछा- " मैं क्या करूं बाबा ! मुझे यह तो बताते जाओ । 

" बूढ़े ने उसकी ओर देखा और बोला- " तुम जो काम सुबह करोगी , वही शाम तक करती रहोगी ।

 " धनी औरत भागकर मकान के अंदर गई और कपड़ा मापने के लिए उसने गज उठाया । मगर तभी उसे जोर से छींक आयी । वह इतने जोर से छीकी कि आंगन में जमा मुर्गियां डर कर पंख फड़फड़ाती इधर - उधर भागने लगी । इसके बाद वह बिना रुके दिन भर छींकती रही - ' आं ... छी ... आं ... छी ...। ' फिर सूर्यास्त होने और अंधेरा छाने पर ही छींकना बंद हुआ । इस तरह उस ईर्ष्यालु धनी औरत को अपने किये का फल मिल चुका था ।

धन्यवाद ❤

जय हिन्द जय भारत। 

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