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धर्म का सौदा।

       



  तथागत एक बार काशी में एक किसान के घर भिक्षा माँगने चले गए । भिक्षा पात्र आगे बढ़ाया । किसान ने एक बार उन्हें ऊपर से नीचे तक देखा । शरीर पूर्णाग था । वह किसान कर्म पूजक था । गहरी आँखों से देखता हुआ बोला- " मैं तो किसान हूँ । अपना परिश्रम करके अपना पेट भरता हूँ । साथ में और भी कई व्यक्तियों का । तुम क्यों बिना परिश्रम किए भोजन प्राप्त करना चाहते हो ? 

        " बुद्ध ने अत्यंत ही शांत स्वर में उत्तर दिया- " मैं भी तो किसान हूँ । मैं भी खेती करता हूँ । " किसान ने आश्चर्य से भरकर प्रश्न किया- " फिर .. अब क्यों भिक्षा माँग रहे हैं ?  

        " भगवान बुद्ध ने किसान की शंका का समाधान करते हुए कहा " हाँ वत्स ! पर वह खेती आत्मा की है । मैं ज्ञान के हल से श्रद्धा के बीज बोता हूँ । तपस्या के जल से सींचता हूँ । विनय मेरे हल की हरिस , विचारशीलता फाल और मन नरैली है । सतत अभ्यास का यान , मुझे उस गंतव्य की ओर ले जा रहा है जहाँ न दुःख है न संताप , मेरी इस खेती से अमरता की फसल लहलहाती है । तब यदि तुम मुझे अपनी .खेती का कुछ भाग दो .. और मैं तुम्हें अपनी खेती का कुछ भाग दूँ  तो क्या यह सौदा अच्छा न रहेगा । "

         किसान की समझ में बात आ गई और वह तथागत के चरणों में अवनत हो गया ।

धन्यवाद

जय हिन्द जय भारत 


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