Subscribe Us

Responsive Advertisement

Advertisement

विद्वान चोर ।

   


  क शहर में पंडित तोताराम नामक विद्वान रहता था किन्तु दुःख की बात  यह  थी कि उस बेचारे के पास केवल विद्या - ही - विद्या थी और घर में ग़रीबी का साम्राज्य था । वह दो समय की रोटी के लिए हरदम चिंतित रहता था । इन्सान भूख भी कब तक बर्दाश्त कर सकता था ? दुःख भी कब तक सह सकता था ।

     मित्र व सम्बन्धी उसके दारिद्र्य के कारण उसे देखते ही आंखें फेर लेते थे क्योंकि उन्हें पता था कि यह भूखा उनसे कुछ - न - कुछ मांगेगा । इतने सारे दुःख सहन करने के पश्चात् भी विवश था । अब तो उसके सामने दो ही रास्ते थे - या तो वह आत्महत्या कर ले या फिर चोर बन जाए ।

      मरने से तो चोर बनना ही अच्छा है , क्योंकि आत्महत्या तो वैसे भी पाप है । यही सोचकर वह विद्वान पंडित चोर बन गया । 

     चोरी करना भी पाप है मगर भूखे मरना तो उससे भी बड़ा पाप है । अब बेचारा विद्वान पंडित चोरी करके अपना पेट पालने लगा । चोर बनते ही जैसे उसके दिन फिर गए । खूब पेट भर कर खाता बल्कि उन सबको भी खिलाता जो भूखे नज़र आते । साधु - संतों को बुलाकर भोजन करवाता । 

     एक बार उस चोर पंडित ने चार ब्राह्मणों को कुछ क़ीमती चीजें बेचते देखा तो उसके मुंह में पानी भर आया । वह सोचने लगा- " इनको कैसे लूटा जाए ? कोई ऐसा ढंग निकालूं जिससे यह सब कुछ उसके क़ब्जे में आ जाए । "

      थोड़ी देर सोचने के पश्चात् वह उनके पास पहुंचा और बड़े - बड़े श्लोक बोलने लगा । उसे इस प्रकार श्लोक बोलते देखकर वे ब्राह्मण बड़े खुश हुए । उन्होंने कहा - ' भाई ! तुम तो बहुत विद्वान ब्राह्मण हो । क्या हमारे पास नौकरी करोगे ? ' 

     किसी ने ठीक ही कहा है - ' अत्यंत शर्मीली नारी कुलटा होती है । '

     ' खारा पानी ठंडा होता है । '

    ' मीठी बातें करने वाला प्राणी ख़तरनाक होता है । '

      उन चार ब्राह्मणों ने अपना कीमती सामान बेचकर और बहुत - सा क़ीमती सामान खरीदा ताकि उसे दूसरे शहर में जाकर बेचकर और धन कमाएं । 

    वह चोर उनका नौकर बनकर इन ब्राह्मणों के साथ ही चलने लगा । उसके मन में तो पाप था ही । वह सोच रहा था कि इनका सारा माल कैसे छीनं ? क्यों न मैं इन्हें जहर देकर मार डालूं और इनका माल लेकर ग़ायब हो जाऊं ।

    इस प्रकार के भाव मन में लिए हुए वह उनके साथ चलते - चलते एक गांवके क़रीब पहुंचा तो वहां पर बैठे एक नाई ने शोर मचाना शुरू कर दिया - ' आओ , आओ - देखो , बड़े धनी पंडित आए हैं । इनका माल लूट लो । ' 

    उस नाई की आवाज़ सुनते ही बहुत से लोग लाठियां - भाले लिए दौड़े आए । सबके मुंह से यही शब्द निकल रहे थे-

    ' पकड़ो ... पकड़ो ... पकड़ो ... शिकार मोटा है , जाने न पाए । ' सब चोरों ने मिलकर उन ब्राह्मणों को घेर लिया । इनमें से एक मोटा - सा आदमी आकर बोला - ' जो कुछ तुम्हारे पास है , वह निकाल दो नहीं तो याद रखो , हम आदमी की चमड़ी उधेड़कर उसके शरीर में से सब कुछ निकाल लेते हैं । ' 

   ' देखो सरदार , हमारे पास धन नहीं है । तुम चाहो तो हमारी तलाशी ले सकते हो । ' चारों ब्राह्मणों ने कहा । ' 

   ओ मूर्ख ब्राह्मणों ! आज तक हमारी बात झूठी नहीं निकली । यदि तुम धन निकालकर नहीं दोगे तो हम तुम्हारे शरीर के टुकड़े कर देंगे । ' 

   उनकी यह बात सुनकर पांचवां चोर ब्राह्मण सोचने लगा कि यही मौका है अपने पापों को धोने का । मैं यदि इन ब्राह्मणों के लिए अपने आपको क़ुर्बान कर दूं तो मेरे सारे पाप धुल जाएंगे । मौत तो हर इन्सान की आती ही है ।

     यह सोचकर उस चोर ब्राह्मण ने उन चारों से कहा - ' देखो भाई , यदि तुम्हें संदेह है कि हमारे पास बहुत - सा धन है तो सबसे पहले मेरे शरीर की तलाशी लो । यदि तुम्हें मेरे पास धन न मिले तो मेरे शरीर के टुकड़े करके फेंक देना और इन्हें छोड़ देना क्योंकि फिर तो तुम्हें विश्वास हो जाएगा कि हम झूठ नहीं बोल रहे । ' 

    उस ब्राह्मण की बात सुनते ही उन चोरों ने उसकी तलाशी ली । जब उसकी तलाशी में उन्हें कुछ भी न मिला तो उन्होंने उस ब्राह्मण के शरीर के टुकड़े - टुकड़े कर डाले । शरीर के टुकड़े होते समय उसने उफ़ तक न की । 

     अब तो चोरों को विश्वास हो गया कि उनके पास कुछ भी नहीं है , नहीं तो ब्राह्मण अपनी जान नहीं दे सकता । उस ब्राह्मण ने सच को सिद्ध करने के लिए ही अपनी जान दे दी है ।

    शेष चारों ब्राह्मणों को इशारा करते हुए डाकुओं का सरदार बोला - ' जाओ भाई ! अब तुम जाओ । हमारी ही भूल थी कि हमने आप पर विश्वास नहीं किया । अब इसकी हत्या करने के पश्चात् यह सिद्ध हो गया कि तुम लोग सच्चे हो । '

     ब्राह्मण बच कर चले गए । मगर उस नौकर के त्याग को वे सदा ही याद रखेंगे जिसने अपनी जान गंवा कर उन्हें बचा लिया । 

शिक्षा : आकंठ पाप में डूबा हुआ व्यक्ति भी यदि विद्वान है , तो अन्तर में उसकी आत्मा जीवित रहती है जो अवसर पाते ही पापपूर्ण भावों को परे धकेलकर उचित एवं नैतिक निर्णय लेती है जैसा उस गरीब , चोर , विद्वान ब्राह्मण ने किया ।

 धन्यवाद ❤

जय हिन्द  जय भारत। 

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ

यह ब्लॉग खोजें

Translate