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बाबा रामदेव जी का जीवन चरित्र ।

  जय बाबरी।

   


 बाबा श्री रामदेवजी का अवतार ( राजस्थान ) बाड़मेर के पास एक छोटे से गांव उण्डू काश्मीर में हुआ । इनके पिता का नाम अजमलजी व माता का नाम मैनादे था । यह उण्डू काश्मीर एवं पोकरण के राजा थे । एक समय अजमल जी ब्रहा मुहूर्त में तालाब से स्नानादि से निवृत होकर आ रहे थे । उस समय कुछ किसान घर से खेत जोतने जा रहे थे । पर अजमल जी को सामने देखकर वह वापस लौट पड़े । इस पर राजा अजमलजी को आश्चर्य हुआ उन्होंने वापस लौटते हुए किसानों को बुलाकर आश्चर्य से लौटने का कारण पूछा । इस पर वृद्ध किसानों ने कहा कि आप महाराजा हैं । हमारे अन्नदाता हैं , पर किसी शुभ काम में जाने से पूर्व बांझ के शगुन होने पर कार्य सिद्ध नहीं होता । इसलिए हम वापस लौट गये । यह सुनकर अजमल जी को अत्यधिक दुःख हुआ । उन्होंने महल में आकर यह बात  रानी जी को बताई । इस पर रानी ने कहा आप द्वारकानाथ जाकर उसी दीनदयाल से विनती करें वही सब दुःखों को हरने वाले हैं । इस प्रकार अजमलजी की द्वारिका यात्रा अन्य ग्रामवासियों के साथ मिलकर द्वारकानाथ की यात्रा पर गये तथा उनसे बार - बार विनती करने पर भी जब मूर्ति नहीं बोली तो उन्होंने प्रसाद की थाली में से लड्डू उठाकर मूर्ति के दे मारा । यह देखकर पुजारी ने कहा भगवान इस समय सोने की द्वारिका में आराम कर रहे हैं , आप वहाँ जाकर प्रार्थना करें और उसने विशाल समुद्र की तरफ इशारा कर दिया यह द्वारिका का रास्ता है । इस प्रकार भगवान भक्त की अजमल जी समुद्र में कूद गये । वहाँ उन्हें साक्षात द्वारिकाधीश के दर्शन हुये । उन्होंने अपना दुःख उन्हें सुनाया । इस पर भगवान ने कहा कि मैं तेरे घर अवतार लूंगा । उस समय पूरे घर में कुंकू के छोटे - छोटे पांव , पानी के बर्तनों में दूधव मन्दिर में पड़ा शंख अपने आप बज उठेगा । उस समय समझना मैंने अवतार ले लिया ।

बाबा श्री रामदेवजी का अवतार जन्म :

      संवत् 1461 भादवा सुदी 2 , प्रात : काल रानी मैनादे की कोख से एक पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई । यह समाचार सुनकर सम्पूर्ण गांव में खुशी छा गई । जगह - जगह मंगलाचार होने लगे व शहनाइयां बजने लगी । पंडितों को बुलाकर बालक का नामकरण कराया और वीरमदेव उनका नाम रखा उधर करुणापति ने देखा कि मेरे अवतार लेने का समय हो गया है तो उसी सायंकाल करुणापति ने महाराज अजमल के घर अवतार लिया । उस समय मंदिर में घंटियां अपने आप बजने लगी , घड़ों के पानी के बर्तनों में पानी दूध में बदल गया और सम्पूर्ण रास्ते में कुंकू के छोटे छोटे पांव बन गये । भगवान अपनी लीला फैलाकर पालने में सोते वीरमेदव के चुटकी भरी इस पर वह रोने लगा । उसे रोता देखकर माता मैनादे आयी और एक की जगह दो बालक देखकर उसे अत्यन्त आश्चर्य हुआ और कहने लगी कि यह एक की जगह दो बालक कहाँ से आ गये । उन्होंने दासी को भेजकर कहा कि महाराज को बुलाओ । उस समय महाराज को द्वारकाधीश की कही हुई बात याद आ गयी और उन्होंने रानी से कहा कि अपने घर में द्वारकाधीश का अवतार हो चुका है । बचपन के दिनों में रामदेवजी माता की गोद में बैठे हुए थे । दूध पी रहे थे कि इतने में चूल्हे पर चढ़ा हुआ दूध उफन ने लगा । माता मैनादे घबरा गयी किन्तु क्या देखती है कि रामदेवजी ने सोते - सोते अपना नन्हा हाथ दूध की तरफ उठाया तो दूध शांत हो गया । यह देखकर माता मैनादे आश्चर्य चकित रह गई । जय रामदेवजी ! आपकी लीला अपरम्पार है । 

 साधारण परिचय स्थान रामदेवरा :

      रामदेवजी ने अपनी राजधानी के लिए उपयोगी रुणीजा नाम से नगर बसाया जो आजकल राजस्थान प्रांत में जोधपुर से 180 किलोमीटर उत्तर - रेलवे पोकरण लाईन पर पोकरण से पहला स्टेशन रामदेवरा नाम से बसा हुआ है । जोधपुर से यहां रेलवे मार्ग , बस , टैक्सी द्वारा पक्का डामर मार्ग आदि साधन है तथा यात्रियों के ठहरने की पर्याप्त सुविधाओं से पूर्ण है । भोजन के लिए होटलों , दुकानों की व्यवस्था मेले के दिनों में विशेषकर रहती है । दीन अनाथों के लिये एक अन्न क्षेत्र भी है । मेले के दिनों में व्यापार सामिग्री के बाजार लगते हैं । कई प्रकार की प्रदर्शनियां , कला - दर्शन तथा प्रचार , सत्संग के केन्द्र लगते हैं । राजकीय व्यवस्था भी सुचारू रूप से ग्राम पंचायत रामदेवरा को योग देकर मेले की सरल सुव्यवस्था बनी रखने में सांझी रहती है । इसके अतिरिक्त कई प्रकार की संस्थाये भी अनेक कैम्प लगाकर यात्रियों की सुविधा में सहयोग देती हैं ।

  धन्यवाद

जय हिन्द जय भारत। 

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