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लालची राहगीर।

   


 दूर कहीं घने जंगल में एक परी रहती थी । वह हर किसी की सहायता करती । एक बार एक राहगीर सोने - चाँदी , कपड़े - लत्तों से भरे गट्ठर को सिर पर लादे हुए गुजर रहा था । अचानक वह राह भटक गया । उसे इस तरह भटकता हुआ देख , परी ने सोचा कि इसे रास्ता बता देना चाहिए । परी ने अपनी छड़ी घुमाई , तो उस राही के रास्ते में हीरे मोती चमकते दिखाई देने लगे ।

     राहगीर की निगाह उन पर पड़ी तो वह सोचने लगा- “ ओह , ये सब चमकते हीरे - मोती मेरे हैं । " पर जैसे ही उसने उन्हें उठाने के लिए हाथ बढ़ाया , वैसे ही हीरे - मोती परछाईं की तरह आगे - आगे भागने लगे । साथ ही परी की मीठी खिल - खिल सुनाई दी ।

     आखिर वह उनके पीछे - पीछे भागने लगा । भागते - भागते काफी दूर निकल गया तो उसने देखा , वह घने - काले जंगल से बाहर निकल आया था । परी ने देखा कि राही जंगल से बाहर निकल आया है , तो उसने अपना चमत्कार समाप्त कर दिया ।

     राही अफसोस में भरा इधर - उधर देखने लगा कि वे सब चमकते हीरे - मोती कहाँ चले गए ?

     इतने में वहाँ से दो ठग गुजरे । उन्होंने देखा कि राहगीर कुछ ढूंढ रहा है । वे बोले- “ लगता है , तुम्हारा कुछ खो गया है । बोलो , हम तुम्हारी क्या मदद करें ? "

     " आप लोग चिंता न करें । मेरी छोटी - सी सूई खो गई है । मैं खुद ही ढूँढ लूँगा । " - राहगीर ने बात बनाई ।

     ठगों ने कहा- " भाई , तुम खुद अपनी सूई ढूँढना चाहते हो , तो ढूँढो , मगर सिर पर रखे गट्ठर को नीचे रख दो और आराम से उसे ढूंढ लो । " 

    जब उसने अपने सिर से गट्ठर नहीं उतारा , तो दूसरे ठग ने कहा इस पुल के पास सोने - चांदी के सिक्के बिखरे पड़े है । कहीं वे तुम्हारे  तो नहीं है ? "

   " हाँ - हाँ , वे मेरे ही हैं । मैं उन्हें ही ढूँढ रहा था । " - राहगीर खुश होकर  बोला । " 

    तो फिर देर किस बात की है ? जाओ और उन्हें ले आओ । अगर तुम्हे विश्वास हो तो अपना गट्ठर यहीं रख दो । हम इसकी रखवाली करेंगे  । " - ठगों ने सलाह दी । 

    रहगीर ने अपना गट्ठर उनकी निगरानी में छोड़ा और ठगो द्वारा बताए स्थान की ओर लालच में भागा चला गया । इधर ठगों ने उसका गट्ठर उठाया और नौ दो ग्यारह हो गए ।

     राहगीर खाली हाथ लौटा , तो ठगों को गट्ठर के साथ गायब पाकर बड़ा दुःखी हुआ । उसने फिर उस राह पर लौटने की कोशिश की जहाँ परी ने हीरे - मोती लुटाए थे । पर अब न हीरे - मोती थे और न परी की खिलखिलाहट । वह सिर झुकाए आगे बढ़ गया । लालच करने की वजह से उसके जीवन की पूरी कमाई लुट चुकी थी ।

सिख : हमें जीवन में कभी लालच नहीं करना चाहिये। ज्यादा के लालच में हम  पहले से जो हमारे पास हे हम वह भी गवा देंगे। 

धन्यवाद

जय हिन्द  जय भारत।  

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