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मनुष्य की अपूर्णता ।


       


 एक बार की बात हे की ब्रह्माजी की इच्छा हुई की " सृष्टि रचे। " उसे  क्रियान्वित किया।   पहले एक कुत्ते को बनाया और उससे उसकी जीवनचर्या की उपलब्धि जानने  के लिए पूछा -''संसार में रहने के लिए तुझे कुछ आभाव ही आभाव दिखाई देते हे ,न वस्त्र ,न आहार ,न घर और न इनके उत्पादन की क्षमता। '' ब्रह्माजी बहुत पछताए।  फिर उन्होंने रचना शुरू की -एक बेल बनाया। जब अपना जीवन क्रम पूर्ण करके वह ब्रहालोग पंहुचा तो उन्होंने उससे भी यही प्रश्न किया। बैल दुखी होकर बोला -''भगवन ! आपने भी मुझे क्या बनाया ,खाने के लिए सुखी घास ,हाथ-पाँवो में कोई अंतर नही ,सींग और लगा दिए। यह  भोंडा शरीर लेकर कहाँ जाऊ। ''तब ब्रम्हाजी ने एक सर्वांग सुन्दर शरीरधारी मनुष्य पैदा किया। उससे भी ब्रह्माजी ने पूछा -"वत्स ,तुझे   अपने आप में कोई अपूर्णता तो नहीं दिखाई देती ?'' थोड़ा ठिठक कर नवनीर्मित मनुष्य ने अनुभव के आधार पर कहा -''भगवन ! मेरे जीवन में कोई ऐसी चीज नहीं बनाई जिसे में प्रगति या समृद्धि कहकर संतोष कर सकता। ''

         ब्रह्माजी गंभीर होकर बोले -''वत्स ! तुझे ह्रदय दिया , आत्मा दी, अपार क्षमता वाला उत्कृष्ट  शरीर दिया।  अब भी तू अपूर्ण हे तो तुझे कोई पूर्ण नहीं कर सकता। ''

इस लेख से पता चलता हे की मनुष्य कभी भी पूर्ण नहीं हो सकता उसकी तृष्णा खभी शांत नहीं होती व मनुष्य जब तक जीवित रहता हे  उसे किसी न किसी बात की तृष्णा लगी रहती हे। 


जय श्री कृष्णा

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